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सुबह उठने में होती है मुश्किल, आलस ना समझिए, ये बीमारी है !

अगर आपको सुबह बिस्तर छोड़ने में काफी जद्दोजहद करनी पड़ती है तो आपको इस पर ध्यान देने की जरूरत है. अगर आप अब तक इसे केवल आलस समझते आए हैं तो बता दें कि यह एक मेडिकल कंडीशन है और इससे दुनिया में काफी संख्या में लोग प्रभावित हैं. डाइसेनिया एक डिसऑर्डर है जिसमें व्यक्ति को सुबह उठने में काफी दिक्कत होती है.

हालांकि अधिकतर लोगों को जगने के बाद फिर से सोने का बड़ा मन करता है. डाइसेनिया पीड़ित लोग कई दिनों तक बिस्तर में रह सकते हैं और उठने के ख्याल भर से ही परेशान हो जाते हैं. डाइसेनिया से पीड़ित होने का शक होने पर तुरंत अपने डॉक्टर को दिखाना चाहिए क्योंकि यह डिप्रेशन, क्रोनिक फैटिग्यू सिंड्रोम और पेन डिसऑर्डर फाइब्रोम्यालगिया का संकेत हो सकता है. डाइसेनिया से पीड़ित होने का दावा करने वाले लोगों का कहना है कि यह डिसऑर्डर भले ही मेडिकली रूप से ना पहचान की जाती हो लेकिन यह काफी रियल है.

वैसे तो अलॉर्म बजते ही हर किसी को गुस्सा आता है, लेकिन डाइसेनिया मरीजों को बिस्तर से उठने में बहुत ज्यादा दर्द महसूस होता है. ऐसे लोगों को 7-8 घंटे से ज्यादा नींद की जरूरत होती है. यहां तक कि बाहरी दुनिया में चाहे कितनी बड़ी कमिटमेंट हो, उसके बावजूद ये बिस्तर से नहीं निकल पाते हैं.
इसका वैसे तो कोई इलाज नहीं है लेकिन पीड़ितों को बिस्तर पर एक या दो घंटे पहले बिस्तर पर जाने से थोड़ी राहत मिल सकती है.

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नैशनल हेल्थ सर्विस (इंग्लैंड) ने अच्छी नींद के लिए कुछ सुझाव दिए हैं-
बिस्तर पर जाइए और हर रोज सुबह एक ही समय पर उठें.
बेडरूम का माहौल शांत होना चाहिए और तापमान, प्रकाश भी नियंत्रित होना चाहिए.
बिस्तर आरामदायक होना चाहिए.
सोने से पहले एल्कोहल लेने से बचें व और ज्यादा खाना ना खाएं.
सोने से पहले धूम्रपान भी ना करें.
अपनी चिंताओं को लिख लें और अगले दिन जो चीजें करनी हैं, उनकी लिस्ट बना लें.
अगर आप तब भी नहीं सो पा रहे हैं तो उठकर कुछ ऐसा करें जिससे आप थकान का अनुभव करें.
डाइसेनिया की मेडिकली पहचान नहीं हुई है इसलिए इसकी वजह भी साफ नहीं है.

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